नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था. उनके पिता श्री जानकी नाथ पैसे से वकील थे जो बाद में 1901 में कटक नगर पालिका के प्रथम गैर सरकारी अध्यक्ष तथा सरकारी वकील एवं लोग अभियोजक बने. वर्ष 1912 में उन्हें बंगाल विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया तथा ” राय बहादुर” का खिताब दिया गया. जिला मजिस्ट्रेट के साथ गंभीर मतभेद हो जाने पर उन्होंने 1917 में सरकारी वकील और लोक अभियोजक के पद से इस्तीफा दे दिया तथा सरकार की दमनकारी नीति के विरोध में उन्होंने ” राय बहादुर” का किताब वापस कर दिया. सुभाष की माताजी प्रभावती कोलकाता में हथखोला के परंपरावादी ” दत्त” परिवार की थी। दृढ़ इच्छा शक्ति वाली महिला, वास्तविकता पहचान की समझ और गहरी सूझबूझ थी। देश की स्वतंत्रता की निमित्त उनके दोनों पुत्रों शरत और सुभाष को जो कष्ट और यातनाएं सहन करनी पड़ी, उन्हें प्रभावती और उनके पति ने बड़े साहस और धैर्य के साथ सहन किया।
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सुभाष चंद्र बॉस जयंती 2026 एक नजर में…
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती हर साल 23 जनवरी को मनाई जाती है। वर्ष 2021 से भारत सरकार ने नेताजी की जयंती को ” पराक्रम दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनके अदम्य साहस, देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके अहम योगदान को समर्पित है। हम विद्यार्थियों से भी बढ़ाना चाहेंगे कि सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें नेताजी के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता थे। 23 जनवरी 1897 को कटक, उड़ीसा में जन्मे, एक निडर देशभक्त, जिन्होंने अपने प्रभावशाली शब्दों और नेतृत्व से लाखों भारतीयों को प्रेरित किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया नारा जो उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया ” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” ।
सुभाष चंद्र बॉस जयंती 2026 जीवन परिचय
23 जनवरी 1897 को जन्म लेने के 5 वर्ष बाद 1902 में सुभाष को कटक के बेपटिस्ट मिशन स्कूल में दाखिल कराया गया। इसके बाद उन्होंने रावेनशा कॉलेजिएट स्कूल, कटक में चौथी कक्षा में दाखिला लिया और 1913 तक यहां अध्ययन किया। यह कुशल बुद्धि के विद्यार्थी थे और अंग्रेजी भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार था। अपने हेड मास्टर श्री माधव दास सेवा अत्यधिक प्रभावित हुए। स्वामी विवेकानंद के दर्शन ने भी उन पर गहरी छाप छोड़ी। 1913 में हाई स्कूल की परीक्षा पास कर उसमें दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने कोलकाता में प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उन्होंने मुख्य विषय के रूप में दर्शनशास्त्र का चुनाव किया, इसी समय स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित ग का अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया गया।
1916 में जो सुभाष चंद्र बोस प्रेसीडेंसी कॉलेज में थे तब उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। इतिहास के प्रोफेसर श्री ई एफ ओटेन पर आरोप लगाया कि प्रोफेसर ने विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार किया है, इस हेतु प्रोफेसर को माफी मांगनी चाहिए किंतु प्रोफेसर ने माफी मांगने से मना कर दिया। इस बात को लेकर कॉलेज में आम हड़ताल की गई, हड़ताल करने वाले नेताओं में सुभाष चंद्र बोस भी शामिल थे हड़ताल लंबी न चले इससे पहले ही प्रोफेसर ने विद्यार्थियों के साथ बैठकर इस विवाद को सौहार्दपूर्ण निपटा लिया। किंतु प्रधानाचार्य ने विद्यार्थियों पर लगाए गए जुर्माने को समाप्त करने से मन कर दिया गया। प्रधानाचार्य की इस विषय को लेकर सरकार के साथ भी अनबन हो गई, जिससे प्रधानाचार्य ने अपने पद से त्याग कर दिया। लेकिन पदभार त्याग करने से पूर्व प्रधानाचार्य ने सुभाष सहित सभी छात्रों के नाम काली सूची में दर्ज कर दिए गए। प्रधानाचार्य द्वारा सुभाष से उन्होंने बर्बाद हुए कहा
” बॉस, कॉलेज में तुम सबसे अधिक उत्पत्ति व्यक्ति हो, मैं तुम्हें निलंबित करता हूं”
सुभाष चंद्र बोस ने विश्वविद्यालय से आग्रह किया कि उन्हें किसी दूसरी कॉलेज में अध्ययन के अनुमति दी जाए परंतु अनुमति नहीं मिली। इस तरह सुभाष चंद्र बोस कॉलेज से नहीं बल्कि विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिए गए।
निकट भविष्य में पढ़ाई जारी रखने की कोई आसा न रहने पर बॉस ने पूरे उत्साह के साथ समाज सेवा का कार्य अपना लिया। जुलाई 1917 में उन्हें अपने पिता की सहायता से कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश मिल गया। 22 वर्ष की आयु में उन्होंने बीए ऑनर्स की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। मनोविज्ञान को प्रमुख विषय के रूप में लेकर एम ए में अपना नामांकन करवाया, भारतीय सिविल सेवा की प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने के लिए इंग्लैंड जाने का निश्चय किया इसके कारण उनको पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी है।
नेताजी सुभाष चंद्र बॉस-स्लोगन
- ”तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”
- ” अपनी ताकत पर भरोसा करो, उधर की ताकत तुम्हारे लिए घातक है”
- ”याद रखिए सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है”
- ” जो भी अपनी ताकत पर भरोसा रखते हैं, हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं। मां का प्यार सबसे गहरा होता है, इससे किसी भी तरह से मापा नहीं जा सकता”
- ”मेरे पास एक लक्ष्य है, जिसे मुझे हर हाल में पूरा करना है। , मेरा जन्म उसी के लिए हुआ है मुझे नैतिक विचारों की धारा में नहीं बहना है”
- ”जिस व्यक्ति के अंदर ‘सनक’ नहीं होती वह कभी भी महान नहीं बन सकता”
- ” हमारी राह भले ही भयानक और पथरीली हो, हमारी यात्रा चाहे कितने भी कष्टदायक हो, फिर भी हमें आगे बढ़ना ही है, सफलता का दिन दूर हो सकता है, पर उसका आना अनिवार्य है”
- ” मैंने अपने छोटे से जीवन का बहुत सार, समय व्यर्थ में ही खो दिया है”
- ” एक सच्चे सैनिक को सैनिक और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की जरूरत होती है”
- ” संघर्ष ने मुझे मनुष्य बनाया, मुझ में आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ, जो पहले मुझ में नहीं था”
- ” इतिहास में कभी भी विचार विमर्श से कोई ठोस परिवर्तन नहीं हासिल किया गया है”
- ” अगर कभी झुकने की नौबत आए, तो याद रखना। हमेशा वीरों की तरह झुकना, कायरों की तरह नहीं”
सुभाष चंद्र बॉस फोटो व स्केच







नेताजी सुभाष चंद्र बॉस – आजाद हिन्द फौज
5 जुलाई, 1943 को जिसे नेताजी अपने जीवन का सबसे अधिक गर्व का दिन कहते थे, उन्होंने सिंगापुर में टाउन हाल के सामने के विशाल मैदान में युद्ध के लिए तैयार खड़ी आजाद हिन्द फौज का इसके सर्वोच्च कमाण्डर के रूप में जायजा लिया था। अपनी सेना को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा थाः
….. हथियारों के बल पर तथा अपने खून की कीमत पर आपको आजादी हासिल करनी है। फिर, जब भारत आजाद हो जायेगा, तो आपको आजाद भारत की एक स्थाई सेना गठित करनी पड़ेगी जिसका कार्य ही हमारी आजादी की सदैव रक्षा करना होगा। हमें अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की ऐसी सुदृढ़ नींव तैयार करनी है कि हमारे इतिहास में हम फिर कभी अपनी आजादी न गवां बैठें…….
मेरे सैनिकों ! हमारा युद्ध का नारा होना चाहिए” दिल्ली चलो ! दिल्ली चलो !” मुझे नहीं पता कि आजादी की इस लड़ाई के बाद हममें से कितने जीवित रह पायेंगे। लेकिन मैं यह जानता हूं कि अंत में हमारी जीत होगी और हमारा यह अभियान तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक हमारे जीवित नायक ब्रिटिश साम्राज्य की एक और समाधि पुरानी दिल्ली स्थित लाल किला अथवा “रेड फोर्ट” पर विजय परेड नहीं करेंगे।
अगले तीन महीनों के दौरान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अथक परिश्रम किया तथा समूचे पूर्व एशिया में फैले भारतीय समुदाय में राष्ट्रीय पहचान तथा देशभक्ति की नई भावना का संचार करने के लिए व्यापक यात्राएं कीं। साथ ही आन्दोलन को चलाने के लिए उन्होंने एक अनुशासित संगठन भी बनाया, जिसका मुख्यालय सिंगापुर में स्थापित किया। दिनांक 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर की एक ऐतिहासिक सभा में उन्होंने आजाद हिन्द नाम की अंतरिम सरकार की घोषणा कर दी। अंतरिम सरकार को नौ राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्रदान की गई जिसमें तत्कालीन तीन विश्व शक्तियां- जापान, जर्मनी और इटली भी शामिल थीं।
आज़ाद हिन्द फौज 4 फरवरी 1944 को अराकान मोर्चे पर पहुंच गई और 18 मार्च को उसने बर्मा सीमा पार की तथा पहली बार भारत भूमि पर आ खड़ी हुई। दुर्भाग्यवश आज़ाद हिन्द फौज इम्फाल में तीन मील के भीतर रोक ली गई और चूंकि उनके पास वायु सेना का अभाव था अतः वह आगे असम के भू-क्षेत्र में न घुस सकी और लार्ड माउन्टबैटन के नेतृत्व में वायु सेना से सुसज्जित अंग्रेजी सेनाएं उनके बढ़ते कदम को रोकने में सफल रहीं। उसी समय शुरू हुई बर्मा की मूसलाधार वर्षा ने आई०एन०ए० की सप्लाई लाइनों को जलमग्न कर दिया। नेताजी ने अपनी फौज को पीछे हटने का आदेश दे दिया।
जर्मनी द्वारा संयुक्त सेनाओं के समक्ष आत्मसमर्पण और जर्मनी द्वारा 1945 में युद्ध-विराम समझौते पर हस्ताक्षर करना भी जापान को युद्ध जारी रखने से नहीं रोक पाया और उन्होंने युद्ध जारी रखने का निर्णय किया। नेताजी ने सेना के पीछे हटने के बाद, अपने साथियों के साथ कई बार विचार-विमर्श किया। लगभग इसी समय जून 1945 में यह समाचार मिला कि भारत में ब्रिटिश वायसराय, लार्ड वावेल, महात्मा गांधी और अन्य कांग्रेसी नेताओं को यह समझाने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें उस समय चल रहे युद्ध में अंग्रेजों के साथ सहयोग करना चाहिए जिसके बदले में वे वायसराय एक्जीक्यूटिव काउंसिल में और भारतीयों को शामिल कर लेंगे। इस प्रस्ताव के बारे में सुनने पर नेताजी हवाई जहाज द्वारा बैंकाक से सिंगापुर गए और उन्होंने रेडियो पर भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को वायसराय द्वारा किए गए प्रस्ताव को स्वीकार न करने के लिए कहा।
नेताजी सुभाष चंद्र बॉस का जीवन-वृत
- जन्म 23 जनवरी 1897 में उड़ीसा के कटक में हुआ।
- पिता जानकीनाथ बोस नगर पालिका के प्रधान, सरकारी वकील रहे थे।
- जानकी नाथ ने 1912 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य बन गए सरकार ने उन्हें ” राय बहादुर” की उपाधि दी।
- सुभाष बाबू ने 1919 में कोलकाता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र की स्नातक परीक्षा में प्रथम चरण से पास किया।
- स्नातक पास के बाद इसी वर्ष ICS की परीक्षा की तैयारी के लिए इंग्लैंड से चले गए।
- देश में घट रही घटनाओं ने उनके आत्मा को झकझोर कर रख दिया 1921 मे उन्होंने आईसीएस से त्यागपत्र दे दिया।
- स्वदेश लौटने के बाद चितरंजन दास और गांधी जी की प्रेरणा से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए.
- चितरंजन दास सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक गुरु थे.
- 1929 में सुभाष चंद्र बोस ने अखिल भारतीय व्यापार संघ कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए.
- 1930 में गांधी जी द्वारा चलाए गए नमक सत्याग्रह में भाग लिया.
- 1938 की हरिपुरा अधिवेशन में सर्वसमिति से अध्यक्ष चुने गए.
- 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में बॉस ने एक बार पुनः अध्यक्ष पद पर चुना गया लेकिन विरोध होने के कारण उनके द्वारा 1939 में ही त्यागपत्र दे दिया गया।
- 3 सितंबर 1939 को इंग्लैंड और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
- जुलाई 1940 में सुभाष चंद्र बोस ने कोलकाता में हॉलिवेल स्मारक को हटाने की मांग को लेकर सत्याग्रह किया जिसके चलते पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए, लेकिन पुलिस को चकमा देकर 17 जनवरी 1941 को पठान जियाउद्दीन के वेश में घर से बाहर निकले और कोलकाता से पेशावर पहुंचे। फिर उनके साथी भगतराम ने उन्हें कबूल पहुंचा दिया.
- काबुल से सुभाष चंद्र बोस रूस पहुंच गए और फिर वहां से जर्मनी।
- बर्लिन मे सुभाष का स्वागत हिटलर के प्रमुख सहायक रिबबेन ट्रोप ने किया तथा उन्हें हिटलर से मिलवाया।
- हिटलर से बॉस ने भारतीय स्वतंत्रता हेतु सहयोग मांगा हिटलर ने उन्हें सहायता के लिए हां कह दी, यहीं पर सुभाष चंद्र बोस को हिटलर ने ” नेताजी” की उपाधि दी।
- जर्मनी में सुभाष चंद्र बोस ने ” फ्री इंडिया सेंटर” की स्थापना की और इसी संस्था द्वारा सुभाष ने पहली बार ”जय हिंद” का नारा दिया।
- 6 नवंबर 1943 को जापानी सेना ने आजाद हिंद फौज को अंडमान और निकोबार द्वीप सौंप दिया।
- 4 जुलाई 1944 को भारतीय राष्ट्रीय सेना के सैनिकों और वहां मौजूद भारतीयों को संबंध करते हुए इस समय सुभाष चंद्र बोस के द्वारा क्रांतिकारी नारा ” तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” दिया गया।
- 6 जुलाई 1944 को बोस आजाद हिंद रेडियो प्रसारण से महात्मा गांधी को संबोधित करते हुए कहा कि ” भारत की स्वाधीनता का आखिरी युद्ध शुरू हो गया है, राष्ट्रपिता भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामना चाहते हैं”
- गांधी जी को राष्ट्रपिता का कर पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने पुकारा।
- 18 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर से टोक्यो के लिए हवाई जहाज से रवाना हुए लेकिन फोरमोसा के हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।
बच्चों के लिए सुभाष चंद्र बोस भाषण
स्पीच-1.
आदरणीय शिक्षक और मेरे प्यारे दोस्तों,
नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हमें कई अच्छे बातें सीखने को मिलती हैं, वह कहते थे कि डर से कुछ नहीं मिलता, उन्होंने हमें सिखाया कि हमें अपने देश से प्यार करना चाहिए और हमेशा सच का साथ देना चाहिए। नेताजी बहुत अनुशासित और समय के बहुत ही पाबंद थे। एक बहादुर और देशभक्त नेता थे। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ। नौकरी लगने के बाद भी उन्होंने बड़ी नौकरी छोड़कर देश की आजादी के लिए काम करने का फैसला किया। नेताजी ने आजाद हिंद फौज बनाई और देश को अंग्रेजों से आजाद करने की कोशिश की। हमें नेताजी के अनुशासन और समय के पाबंद को ध्यान में रखते हुए रोज समय पर स्कूल आना चाहिए, मेहनत से पढ़ाई करनी चाहिए अच्छा इंसान बनना चाहिए। जय हिंद जय भारत, जय जवान जय किसान।।
स्पीच 2.
प्रिय साथियों,
आप सबको विदित है कि आज यहां हम सभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर इकट्ठा हुए हैं। नेताजी का सपना था भारत देश मजबूत और खुशहाल, अपने आप पर निर्भर बने। ” तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” यह नारा आज भी आपके दिमाग में गूंजता होगा। मैं आपको बताना चाहता हूं आज के दिन को भारत सरकार द्वारा नेताजी की याद में 2021 से ” पराक्रम दिवस” के रूप में मनाया जाता है। व नेताजी चाहते थे कि हमारे देश का प्रत्येक बच्चा पढ़ लिखकर इस देश का नाम रोशन करें। वह कहते थे की हर बच्चा एक छोटा सिपाही होता है, हम अगर ईमानदार बने, दूसरों की मदद करें और अपने माता-पिता व टीचर्स का सम्मान करें तो यही नेताजी का सपना पूरा करना होगा।
स्पीच – 3
आदरणीय प्रिंसिपल महोदय, अध्यापक गण और मेरे प्यारे साथियों!
आज 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है। देश के स्वाधीनता आंदोलन के नायकों में से एक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को पूरा देश आज के दिन पराक्रम दिवस के रूप में मना रहा है। नेताजी कि इस जयंती पर आओ हम सब मिलकर महान व्यक्तित्व, बहादुर और हिंदुस्तान की आजादी के लिए अपने प्राण निछावर कर देने वाले इस नेता को नमन करते हैं। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, इस प्रकार के नारों से आजादी की लड़ाई में एक नई ऊर्जा मिली। नेताजी अपना आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद को तथा राजनीतिक गुरु चितरंजन दास को मानते थे। नेताजी की जीवनी, शौर्य, और देश प्रेम, कठोर त्याग आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। नेताजी का दिया हुआ जय हिंद का नारा आज भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। मेरे सामने बैठे सभी साथियों से अपील करना चाहूंगा की आओ हम सब मिलकर भी नेताजी की तरह अपने गांव, अपने परिवार, अपने देश, अपने विद्यालय के लिए कुछ ऐसा करते हैं जिसे पूरा देश युगों युगों तक याद करें। जय हिंद, जय भारत, भारत माता की जय।।
नेताजी की मृत्यु – एक रहस्य
आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के स्थगन के पश्चात् सुभाष चन्द्र बोस वापस सिंगापुर गए और उन्होंने नागरिकों और सरकार की थल सेना स्कंधों को अनुदेश जारी किए कि उन्हें क्या करना चाहिए। कैबिनेट मंत्री सिंगापुर छोड़ने और आगे पूर्व में जाने के लिए सहमत हो गए। इसी बीच, जापान के समर्पण की 15 अगस्त, 1945 को सरकारी तौर पर घोषणा की गई। नेताजी ने 17 अगस्त, 1945 को सैगोन से हवाई जहाज पकड़ा। पांच दिन बाद, 22 अगस्त, को तोक्यो रेडियो ने घोषणा की कि सुभाष चन्द्र बोस की जापान जाते हुए 18 अगस्त, 1945 को फारमोसा में विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
जब विधान सभा के कुछ सदस्यों ने तोक्यो रेडियो द्वारा की गई घोषणा की प्रामाणिकता के संबंध में प्रश्न किया और 12 फरवरी, 1946 को सरकार को समाचार की पुष्टि के लिए कहा, तो सरकार की ओर से विधान सभा में निम्नलिखित उत्तर दिया गयाः
सरकार ने एडमिरल माउंटबैटन के और जनरल मेकआर्थर के मुख्यालयों के हवाले से श्री सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु की सूचनाओं के सत्यापन के लिए कदम उठाए हैं। इन चैनलों के माध्यम से जापान की सरकार और उनकी एजेंसियों को यह सूचना प्राप्त हुई है कि वह विमान, जिसमें श्री बोस जापान जा रहे थे, 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू हवाई पट्टी से उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया और दुर्घटना के समय आई चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा एक ग्रंथ प्रकाशित किया गया था जिसमें नेताजी के लेखों से लिये गये उद्धरण संकलित किए गए थे। इस ग्रन्थ में प्रकाशनार्थ भेजे अपने संदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा थाः
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हमारे स्वतंत्रता संग्राम के नायक हैं। अपने साहस और अथक परिश्रम के कारण ही नेताजी भारत के युवाओं के एक अग्रणी नेता बने। युद्ध के दौरान नाटकीय पलायन और उनके नेतृत्व में आज़ाद हिन्द फौज का पराक्रम एक अमर गाथा है। आज हमने “जयहिन्द” शब्द को सामूहिक आह्वान हेतु राष्ट्रीय नारे के रूप में स्वीकार कर लिया है जो हमें निरन्तर यह याद दिलाता है कि हम नेताजी के कितने आभारी हैं।

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